स्वामी विवेकानंद के 10 अनमोल वचन, जो बदल देंगे आपके जीवन की दिशा


स्वामी विवेकानंद उन महान विभूतियों में से एक हैं जिन्होंने अध्यात्म के साथ ही देशभक्ति की पताका फहराई। 11 सितंबर 1893 को शिकागो के विश्वधर्म सम्मेलन में जब उन्होंने उद्बोधन दिया तो अमेरिका सहित पूरा विश्व चमत्कृत रह गया।

12 जनवरी 1863 को जन्मे स्वामीजी का लौकिक जीवन मात्र 39 वर्ष ही रहा। 4 जुलाई 1902 को वे मानव देह त्यागकर अमर हो गए लेकिन उन्होंने देश के सम्मान और स्वाभिमान के लिए जो किया, वह युगों-युगों तक बरकरार रहेगा।

जानिए स्वामी विवेकानंद के अनमोल वचन जो आपके जीवन की दिशा बदल सकते हैं।

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1- मन का विकास करो और उसका संयम करो। उसके बाद जहां इच्छा हो, वहां इसका प्रयोग करो। उससे अतिशीघ्र फल प्राप्ति होगी। यह है यथार्थ आत्मोन्नति का उपाय। एकाग्रता सीखो, और जिस ओर इच्छा हो, उसका प्रयोग करो। ऐसा करने पर तुम्हें कुछ खोना नहीं पड़ेगा। जो समस्त को प्राप्त करता है, वह अंश को भी प्राप्त कर सकता है।

2- सभी मरेंगे- साधु या असाधु, धनी या दरिद्र- सभी मरेंगे। चिर काल तक किसी का शरीर नहीं रहेगा। अतएव उठो, जागो और संपूर्ण रूप से निष्कपट हो जाओ। भारत में घोर कपट समा गया है। चाहिए चरित्र, चाहिए इस तरह की दृढ़ता और चरित्र का बल, जिससे मनुष्य आजीवन दृढ़व्रत बन सके।

3- संन्यास का अर्थ है, मृत्यु के प्रति प्रेम। सांसारिक लोग जीवन से प्रेम करते हैं, परंतु संन्यासी के लिए प्रेम करने को मृत्यु है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम आत्महत्या कर लें। आत्महत्या करने वालों को तो कभी मृत्यु प्यारी नहीं होती है। संन्यासी का धर्म है समस्त संसार के हित के लिए निरंतर आत्मत्याग करते हुए धीरे-धीरे मृत्यु को प्राप्त हो जाना।


4- किसी बात से तुम उत्साहहीन मत बनो। जब तक ईश्वर की कृपा हमारे ऊपर है, कौन इस पृथ्वी पर हमारी उपेक्षा कर सकता है? यदि तुम अपनी अंतिम सांस भी ले रहे हो तो भी न डरना। सिंह की शूरता और पुष्प की कोमलता के साथ काम करते रहो।

5- लोग तुम्हारी स्तुति करें या निंदा, लक्ष्मी तुम्हारे ऊपर कृपालु हो या न हो, तुम्हारा देहांत आज हो या एक युग में तुम न्यायपथ से कभी भ्रष्ट न हो।

6- बालकों, दृढ बने रहो, मेरी संतानों में से कोई भी कायर न बने। तुम लोगों में जो सबसे अधिक साहसी है – सदा उसी का साथ करो। बिना विघ्न-बाधाओं के क्या कभी कोई महान कार्य हो सकता है? समय, धैर्य तथा अदम्य इच्छा-शक्ति से ही कार्य हुआ करता है।

7- भाग्य बहादुर और कर्मठ व्यक्ति का ही साथ देता है। पीछे मुड़कर मत देखो। आगे अपार शक्ति, अपरिमित उत्साह, अमित साहस और निस्सीम धैर्य की आवश्यकता है- और तभी महान कार्य निष्पन्न किए जा सकते हैं। हमें पूरे विश्व को उद्दीप्त करना है।


8- साहसी होकर काम करो। धीरज और स्थिरता से काम करना – यही एक मार्ग है। आगे बढ़ो और याद रखो, धीरज, साहस, पवित्रता और अनवरत कर्म। जब तक तुम पवित्र होकर अपने उद्देश्य पर डटे रहोगे, तब तक तुम कभी निष्फल नहीं होओगे। मां तुम्हें कभी न छोड़ेगी और पूर्ण आशीर्वाद के तुम पात्र हो जाओगे।

9- जो पवित्र तथा साहसी है, वही जगत् में सबकुछ कर सकता है। माया-मोह से प्रभु सदा तुम्हारी रक्षा करें। मैं तुम्हारे साथ काम करने के लिए सदैव प्रस्तुत हूं एवं हम लोग यदि स्वयं अपने मित्र रहें तो प्रभु भी हमारे लिए सैकड़ों मित्र भेजेंगे।

10- यदि कोई तुम्हारे समीप अन्य किसी साथी की निंदा करना चाहे, तो तुम उस ओर बिल्कुल ध्यान न दो। इन बातों को सुनना भी महान पाप है। उससे भविष्य में विवाद का सूत्रपात होगा।

Source – Rajasthanpatrika


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